सर्द रातों की शीत हवाएं
बर्फ़ की चादर जैसे ओढ़े आएं
इज्तिराब भरी सी अंगड़ाई
तिल तिल कर मानो
काली रातें सब बीताईं
फ़िर ठीठकी ठिठुरन तोड़े नई धूप , ज्यों दस्तक लाई
नींद खुलीं , सृष्टि ने ली हो मानो अंगड़ाई
नई कोपल , नया जीवन , नई उत्साह के साथ ,
मूंद सभी संदेह के कपाट
नई सहर की नई किरण आई
कर हौसलें बुलंद , नई आस है लाई ।
छोड़ पीछे सारे गम
उम्रदराज़ने चला ये मन ।
अब दुआएं महज़ इतनी जो क़बूल हो जाएं
ख़ुदा करे कि ऐसा एक साल आए ,
खुली सोच व सूझ-बूझ वो साथ लाए ।
मंज़र की भूख़ हो इतनी के ,
विफलता से मन कभी ना घबराए
कोशिशों का मैदान विस्तृत हो इस कदर ,
के गेंदों का हिसाब भी कम पड़ जाए
मुंताजिरों से देखे , हर ख़्वाब को बस
अवसर की , एक मुकम्मल ज़मीन तो मिल जाए
के आजमा पाए ना हाथ अपना ,
ये कसक कहीं दिल में ना रह जाए ।
कदमों पे ना रोक हो ,
ना हों बंदिशें आलस की
नाप दें ये ज़मीं सारी ,
के आसमां भी छोटा ये पड़ जाए ।
रिश्तों में बंधी जो प्रेम की डोर ,
तहज़ीब से आज की
ना हो जाए कहीं बेहोश
मतलब की दुकानों पे ,
कोड़ियों के भाव ही
कहीं लग ना जाएं उनके मोल ।
रिश्ते जब भी मुद्रा रख कर , किए जाते तोल
आडंबर सब बिखर के गिरता
हो जाते बेजोड़ ।
मुख्तसर में कहें तो
ग़लत किसी सही के साथ ना हो जाए
अपराधबोध से बढ़कर ना , अहंकार हो जाए ।
ख़ुदा करे कि ऐसा एक साल आए
जब उत्तरदायित्व का भान थोड़ा बढ़ जाए
ना रहें मैं-तू के फासले जब
आचार-भद्रता दंभ की , ये ऊंची दीवार चढ़ जाएं ।
देख तरक्की पड़ोस , आंखें मुस्कुराएं
हर मन इन्सानियत यूंही बस जाए
ना बदलें चाहें कुछ गर ये ज़माना ,
पर जीत-हार के परे हों तजुर्बों का अफ़साना ।
किसी पे ना मौकूफ हो आत्म सम्मान हमारा ।
ख़ुदा बक्शे ऐसे दिन दोबारा ,
जब हम बन खड़े हों , एक-दूजे का सहारा ।
अब दुआएं महज़ इतनी जो क़बूल हो जाएं
ख़ुदा करे कि ऐसा एक साल आए ,
के कल से बेहतर कल हम हो जाएं
मुकाबला ना जीतें भले
फकत स्वयं पे फतेह ही हासिल हो जाए ।
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